न कोई मेरी मंजिल है न किनारा
तन्हाई मेरी महफिल और यादें मेरा सहारा
उनसे बिचाद कर कुछ यूं वक्त गुज़रा
कभी ज़िंदगी को तरसे कभी मौत को पुकारा
——————
यादो मैं कभी आप भी खोये होगे
खुली आंखो से कभी आप भी सोये होगे
माना हँसना है आदत गम छुपाने की
पर हस्ते हस्ते कभी आप भी रोये होगे
——————
जो पूछता है कोई सुर्ख किउन हैं आज आंखें
तो आंख मॉल के खेती हों के रात सो न सकी
हज़ार चाहों मगर यह न खे सको गी कभी भी
के रात रोने की खुव्हिश थी मगर रू न सकी
——————
चाँद लम्हात के वास्ते ही सही
मुस्कुराकर मिली थी मुझे जिंदगी
तेरी आघोष में दिन थे मेरे कटे
तेरी बाहों में थी मेरी राते कटी
आज भी जब वह पल मुझको याद आते है
दिल से सारे ग़मों को भुला जाते है
बीते लम्हें हमें जब भी याद आते है